श्रीगंगानगर की राजनीति
हम से दूर रहकर पास बने रहने का अहसास दिल में रखने वालों को राजनीति की खट्टी-मीठी बातों से अवगत करवाने का एक प्रयास।
बृहस्पतिवार, 17 मई 2012
गौरव की बात है आईपीएस होना यहां आना हमारा दुर्भाग्य
शुक्रवार, 11 मई 2012
ये एसपी तो मस्त है यार
जयपुर के राजनीतिक और सत्ता के गलियारों की खबर
शुक्रवार, 4 मई 2012
पांच करोड़ का कमाल कलेक्टर पहुंचे बी डी की सभा में
सोमवार, 30 अप्रैल 2012
सरकार जैसी दिखने वाली यह सरकार है भी या नहीं
शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012
गंगा सिंह जी के बाद अंबरीष कुमार जी का नगर भ्रमण
बुधवार, 18 अप्रैल 2012
शंकर पन्नू की याद है या भूल गए जनाब
श्रीगंगानगर-राजनीति रोमांचक तो है किन्तु निष्ठुर भी बहुत है। इतनी निष्ठुर कि उस व्यक्ति की याद तक नहीं आती जिसकी चर्चा हर स्थान पर होती थी। छोटे बड़े हर कार्यक्रम में उसकी उपस्थिति अनिवार्य जैसी ही थी। इसी प्रकार का व्यवहार राजनीति ने शंकर पन्नू की साथ किया है। अब ये भी बताना पड़ेगा कि कौन शंकर पन्नू....अरे इंजीनियर शंकर पन्नू जो पीएचईडी में अधिकारी थे। जो बाद में जिला प्रमुख बने...याद आया? नहीं....1998 में श्रीगंगानगर से एम पी चुने गए थे....वही....जो दूसरे चुनाव में हार गए थे। फिर 2003 में टिब्बी विधानसभा का चुनाव लड़ा। यस...वही शंकर पन्नू। जिनका कोई कार्यकाल कभी पूरा नहीं हुआ। सरकारी अफ़सरी से त्याग पत्र दिया। सांसद बने तो जिला प्रमुखी छोड़नी पड़ी। सांसद भी कुछ माह ही रहे। इस बार 2008 में जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने तो शंकर पन्नू के चेहरे की चमक देखने ही वाली थी। सब जानते हैं कि श्री गहलोत से उनके खास रिश्ते हैं। आना जाना जयपुर होता रहा। उम्मीद थी कि राजनीतिक नियुक्तियों में शंकर पन्नू के नंबर जरूर आयेगा। वह भी बढ़िया जगह पर। जब नियुक्तियों का सिलसिला आरंभ हुआ तो दिल में रोमांच था। अब आया नाम...अब आया। सबके नाम आ गए परंतु पन्नू जी का नाम कहीं ना दिखा ना पढ़ने में आया। नगर विकास न्यास की चेयरमेनी से लेकर...ऊपर तक के बोर्ड -निगम का दायित्व मिलने की उम्मीद थी...चर्चा भी रही। अफसोस कुछ नहीं मिला। हालांकि सरकार का कुछ नहीं पता कब किसको क्या दे दे...लेकिन शंकर पन्नू को अब कोई पद मिलने की उम्मीद राजनीतिक हल्कों में कम ही है। वैसे भी शंकर पन्नू की राजनीतिक सक्रियता बहुत कम ना के बराबर है। जहां किसी मरगत,शादी और किसी प्रोग्राम में दिखते हैं तो वह उनकी सामाजिकता है। उनकी यह उपस्थिति सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर है। लोगों की सोच भी उनके लिए यही है कि पन्नू जी तो राजनीति से चलते बने।राजनीति आजकल फूल टाइम “जॉब” है। वो शंकर पन्नू के पास है नहीं। वे शहर से दूर नहर किनारे अपनी नर्सरी/फार्म हाउस में रहते हैं। उनका पुनर्वास होगा या नहीं कहना मुश्किल है। क्योंकि यह राजनीति है। जिसमें ना तो कोई भविष्यवाणी की जा सकती है और ना ही किसी संभावना से इनकार। दो लाइन....टूट गए हैं रिश्ते किस्से खत्म हुए,तुम क्या जानो बात कितने जतन हुए।
बुधवार, 11 अप्रैल 2012
संधू एंड कंपनी और गौड़ अब राजनीति में साथ साथ
श्रीगंगानगर-राजनीति में किसी से किसी भी प्रकार का संबंध कभी स्थाई नहीं हो सकता। यहां नए रिश्ते बनते भी देर नहीं लगती और पुराने बिगड़ते भी। एक से अनेक हो जाते हैं और अनेक से एक। कोई अधिक समय नहीं हुआ जब पृथ्वीपाल सिंह संधू एंड कंपनी के रिश्ते “सेठ” से बहुत प्रगाढ़ थे। पारिवारिक कहे जाते थे। दिल्ली जयपुर के राजनीतिक गलियारों में एक साथ जाना। राजनीति में गोटी फिट हो गई। किस्मत ने साथ दिया। सेठ न्यास के अध्यक्ष बन गए। संधू एंड कंपनी की बल्ले बल्ले हो गई। पर ये समय है...एक समान कहां,कब रहता है। पलट गया समय... अध्यक्ष बने सेठ ने संधू के बंदों के अहम पर चोट की...मतलब इनके तालाब की मछली इनको ही आँख दिखाने लगी। सेठ और संधू एंड कंपनी का याराना टूट गया। रिश्ते बिगड़ गए। संबंध समाप्त। रास्ते अलग अलग। इसके बावजूद संधू एंड कंपनी के दिलो दिमाग पर सेठ के साथ रिश्ते की मिठास और उसका रस आज भी है। लेकिन ये राजनीति हैं...यहां स्वार्थ,अहम जब टकराते हैं तो फिर रसगुल्ले जैसी मिठास और रस वाले रिश्तों की परवाह नहीं की जाती। नए रिश्ते तलाश किए जाते हैं। यह तलाश राजकुमार गौड़ पर जाकर समाप्त हो गई। इसमें कोई पर्दा नहीं है कि संधू एंड कंपनी ने विधानसभा चुनाव में गौड़ साहब की कितनी और किस प्रकार मदद की थे। परंतु यही तो राजनीति है...दोनों को एक दूसरे की आज जरूरत है। गौड़ साहब को थोड़ी आशंका है कि सेठ उनका प्रतिद्वंद्वी ना बन जाए। इसलिए उसको कमजोर रखना जरूरी है....संधू एंड कंपनी उसको आँख दिखाने का परिणाम दिखाना चाहती हैं। दोनों की मंजिल एक थी इसलिए ये दोनों नजदीक आ गए।श्री गौड़ का श्रीगंगानगर विधानसभा क्षेत्र में अपना महत्व है। मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते भी बढ़िया है। संधू एंड कंपनी की दिल्ली जयपुर में अच्छी लाइजनिंग है। अब गौड़ और संधू गुट फिलहाल एक है। यह एकता केवल सेठ जी को निपटाने तक ही है या दूर तक दिखाई देगी ये कहना मुश्किल है। क्योंकि यह ऊपर लिखा जा चुका है कि राजनीति में रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं। वैसे श्रीगंगानगर में ये दोनों गुट ही अधिक प्रभावी हैं। किन्तु फिलहाल दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। चाहे दिखावे के लिए ही सही।
सोमवार, 19 मार्च 2012
जो सरक सरक के काम करे वह सरकार
श्रीगंगानगर- जब से कुछ जानने लगा हूं तभी से यही मानता रहा कि सरकार वह जो सरक सरक के काम करे। लेकिन कोई केंद्र सरकार इतनी भी सरक सकती है ये नहीं सोचा था। इसे सरकना कहा तो क्या कहा....यह तो रेंगना हुआ....साफ साफ रेंगना। कई दिन से नाटक खेला जा रहा है हिंदुस्तान की छाती पर....देश की आन,बान,शान को मिट्टी में मिलाने का। इसके पात्र हैं सभी राजनीतिक दल। कोई आदमी तो मजबूर हो सकता है। कोई सरकार भी इतनी मजबूर होगी ये तो कल्पना से परे है। देश की चिंता नहीं। जनता के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं। सब के सब लगे हैं अपनी खुंदक निकालने में। अपने अहंकार को और अधिक पुष्पित,पल्लवित करने में। एक दूसरे को नीचा दिखाने में। अपनी अपनी नाक को ऊंचा रखना है। देश की नाक कटे तो कटे। लगता ही नहीं कि कोई सरकार चला रहें हैं। ये तो धक्केशाही है इस देश के आमजन के साथ। जिस प्रकार ये देश चला रहें हैं इस प्रकार से तो कोई घर नहीं चलता। देश को संभालने की बात तो बहुत दूर की है। ये क्या सरकार....ये कैसा प्रधानमंत्री....जिसका जी किया आँख दिखा दी....जिस किसी कि इच्छा हुई उसने टेंटुआ दबा दिया। ऐसी क्या मजबूरी...अपने जमीर को तो आपने मैडम के कदमों में डाल दिया। देश की प्रतिष्ठा का तो कोई ख्याल करो। इसकी इस प्रकार तो मिट्टी ना करो। कुछ तो मर्दानगी दिखाओ। ममता...मुलायम ताबे नहीं आ रहे तो आ जाओ चुनाव मैदान में। रोज रोज का नाटक तो समाप्त हो। देश का रेल मंत्री...या कोई भी मंत्री कौन होगा....त्रिवेदी...हो या चतुर्वेदी...मुकुल हो या नुकुल....इससे से जनता का कोई मतलब नहीं होता। जनता से पूछ कर कोई किसी को बनाता या हटाता भी नहीं है। परंतु किसी को हटाने...बनाने का ये क्या तरीका हुआ। इस प्रकार तो बच्चों की गली वाली क्रिकेट टीम में भी नहीं होता। पूरा संसार नेताओं का यह नाटक देख रहा है। मामूली सी समझ रखने वाला भी कह देगा कि यह गलत हो रहा है। किन्तु अफसोस इनको खुद को यह महसूस नहीं हो रहा। ओह! इनको महसूस हो भी कैसे....इनके दो वो दिल ही नहीं जो जनता की भावनाओं को समझ सकें। ऐसा होता तो ये नाटक होता ही नहीं। चलो ये पढ़ो—मनमोहन जी टिके हुए हैं बिना किए कुछ काम,उनकी जुबां पर रहता है बस इक मैडम का नाम, भज ले नारायण का नाम, भज ले नारायण का नाम