बृहस्पतिवार, 17 मई 2012

गौरव की बात है आईपीएस होना यहां आना हमारा दुर्भाग्य



श्रीगंगानगर-श्रीमानआईपीएस गगनदीप सिंगला जी बिना नमस्कार के ही बात शुरू करनी पड़ेगी....क्योंकि आप अहंकारी हो,अव्यवहारिक हो ....आपने नमस्कार का जवाब देना नहीं इसलिए आपको नमस्कार करके अपना अपमान क्यों करवाऊँ। सिंगला जी आपने आईपीएस बनकर यहाँ की जनता पर कोई अहसान नहीं किया। ना तो जनता ने आपके यहां जाकर आपके परिवार से अनुनय विनय की और ना भगवान से प्रार्थना। यह सौ प्रतिशत आपकी मेहनत,लगन और परिवार की मंगलभावना थी जो आप आईपीएस बने। हमारा दुर्भाग्य जो आप प्रशिक्षण के लिए यहां आए। दुर्भाग्य इसलिए कि जो यहां प्रशिक्षण प्राप्त करता है वह एक दिन एसपी बनकर यहां आता है। अगर आप एसपी बनकर आए और आपका स्वभाव और व्यवहार यही रहा तो आपको तो पता नहीं लेकिन जनता को मुश्किल होगी...बहुत मुश्किल। मैंने तो पढ़ा था....आपने पढ़ा कि नहीं पता नहीं...कि ज्ञानवान,गुणवान,बड़े पद वाले इंसान बहुत विनम्र,शालीन होते हैं...आपके इर्द गिर्द तो यह सब है ही नहीं। आईपीएस होना अलग है और ज्ञानवान,गुणवान,व्यवहार कुशल,संस्कारी होना अलग।आईपीएस तो किताबें रट कर मेहनती युवक बन सकता है। परंतु दूसरे गुणों के लिए अपने अंदर झांकना पड़ता है। दूसरों का दर्द,पीड़ा को समझना होता है। ये सब आप करेंगे ऐसा आपका व्यवहार से लगता नहीं।  आईपीएस बनना खुद के लिए,घर,समाज,राज्य के लिए गौरव की बात है। यह गौरव आप  बढ़िया काम से,विनम्रता से,व्यवहार कुशलता से और अधिक बढ़ा सकते हो। यह सब करने का आपके पास अभी तो समय है। एक बार समय हाथ से निकल गया तो आप आईपीएस तो रहेंगे...नाम और दाम भी होंगे आपके पास...किन्तु जनता के दिलों में आपका कोई स्थान नहीं होगा। जहां जाएंगे वहाँ की जनता आपके तुरंत वापिस जाने की दुआ करेगी। निर्णय आपने करना है....हमारा काम तो लिखना है...मानो ना मानो आपकी मर्जी। आपका स्वभाव ये बताता है कि आपने इस लिखे पर गौर तो क्या करना है...लिखने वाले के प्रति मन में गांठ जरूर बांध लेनी है। अकील नूमामी की लाइन है....सिर्फ ले देके यही एक कमी है हममें,हम हर इक शख़्स को इंसान समझ लेते हैं।

शुक्रवार, 11 मई 2012

ये एसपी तो मस्त है यार


श्रीगंगानगर-जिले का एसपी हंसते हुए मिले तो मुलाकाती के मन को सुकून मिलता है। सुकून की यह सरिता यहां तब तक बहती रहेगी जब तक चालके संतोष कुमार तुकाराम यहां रहेंगे। यस, ऐसे ही हैं संतोष चालके....इस जिले के नए एसपी। सभी से दिल खोलकर...चेहरे पर एवरग्रीन स्माइल के साथ मिलते हैं एसपी। आओ....मिलो....बात करो और जाओ। गप्प बाजी के लिए समय नहीं। वेटिंग रूम खाली रहना चाहिए ताकि अन्य जरूरी काम होते रहें। वे कहते हैं.....सभी से मिलना...व्यवहार कुशलता....ऑफिसर का सम्मान....कोई काम नहीं तब भी मान देना इस जिले के लोगों की विरासत है। इस विरासत का मान रखना मेरा भी कर्तव्य है। इस रिपोर्टर से बात चीत में श्री चालके ने कहा...आम आदमी को 24 घंटे मोबाइल फोन पर उपलब्ध रहूँगा। उसको पुलिस के पास जाने के लिए किसी मिडल मेन को ढूँढने की जरूरत नहीं है। कोई मुझसे मिलने आया और मैं फोन पर बात करूँ...ये नहीं होगा। उनका  कहना था कि पांच छह साल पहले जब मैं यहां रहा जब प्राथमिकता अलग थी। तब से अब तक काफी बदलाव हुए हैं। इस लिए प्राथमिकता बदलती रहती हैं। देखुंगा अब क्या प्राथमिकता हो...उसी के अनुरूप बढ़िया काम करेंगे। बीट सिस्टम को प्रभावी बनाया जाएगा। इसकी बहुत उपयोगिता है इसलिए बीट कांस्टेबल को मोबाइल की सिम फ्री दी जाती है। खुद मुख्यमंत्री ने इसको लागू किया। बेशक कांस्टेबल की बदली हो जाए परंतु बीट कांस्टेबल का मोबाइल नंबर वही रहेगा। किसी और कांस्टेबल को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। बीट कांस्टेबल पहले से अधिक सजगता और कार्यक्षमता से काम करे यह प्रयास किया जाएगा। बातचीत हो रही थी कि संगठन ज्ञापन देने आ गया। कुछ लोगों को एसपी ने बुलाया...जो आए उनमे  महेश पेड़ीवाल भी थे। एसपी उनको देखते ही बोले.. कैसे हो महेश पेड़ीवाल जी।ज्ञापन देने वालों ने धर्मांतरण की बात की। एसपी ने इस विषय पर मुस्कराते हुए जो तर्क दिये उससे मुस्कराते चेहरे के पीछे विचारों की दृढ़ता भी दिखाई दी। उनके तर्कों से सभी निरुतर हो गए। बाहर आकर एक नेता बोला...एसपी मस्त है यार। सच में आज तो एसपी मस्त हैं.....कल इस क्षेत्र की हवा क्या करेगी...इसकी चर्चा मौका मिला तो फिर कभी। सज्जाद मिर्जा कहते हैं...मुझे देखा जो तुमने मुस्करा कर,मैं अपने आप को अच्छा लगा हूँ।

जयपुर के राजनीतिक और सत्ता के गलियारों की खबर



श्रीगंगानगर-बीजेपी और कांग्रेस  के नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।एक दूसरे को निपटाने के फेर में खुद निपट रहें हैं। वसुंधरा राजे 60-65 विधायकों के इस्तीफे आ जाने से खुश हैं। विरोधी ये सोच कर प्रसन्न हैं कि प्रदेश में सीट  तो दो सौ हैं...मैडम के साथ तो इतने ही हैं। कार्यकर्ताओं का भी जोड़ बाकी किया जा रहा है। लाखों कार्यकर्ताओं में से हजारों ने मैडम का समर्थन किया....बाकी किसके साथ है?जीत अपने आप चल कर मैडम की ओर आ रही थी। मैडम पीछे हो ली। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को आज भी सामंतशाही आँख दिखाती है। विश्वेन्द्र सिंह का अभी तो कुछ बिगड़ा नहीं। खुले आम चुनौती दे रहा है....कर लो जिसने जो करना है। अब डॉ चंद्रभान से कौन पूछे की फिर भरतपुर कब जाना है। इन सब घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का चेहरा अधिक खिला खिला रहता है। रहेगा ही...इस लड़ाई से राजनीतिक लाभ तो उन्ही को मिलेगा।
तबादले खुल गए। मंत्रियों के मेला लगा है। विधायकों का...पुलिस और नागरिक प्रशासन के छोटे बड़े अधिकारियों का। विधायक लगभग सभी मंत्रियों के पास डिजायर लेकर नमस्कार करने पहुँच रहें हैं वे साफ कहते हैं विधायक का बेड़ा पार तो मंत्री ही लगाएंगे। मंत्री दूसरे मंत्री को डिजायर भेज रहा है। किसी सीनियर के पास खुद भी जाना पड़ता है। खास डिजायर सीधे सीएम तक पहुंचाई जाती है। हर मंत्री का लगभग पूरा स्टाफ इसी काम में लगा है। क्योंकि अगले साल चुनाव है...इसलिए विधायक,मंत्री सभी कार्यकर्ताओं को राजी रखने की कोशिश में हैं। बड़े बीजेपी के नेता भी चुपके से किसी मंत्री को फोन कर किसी अधिकारी/कर्मचारी को अपने क्षेत्र में लगाने का आग्रह कर देता है। राजनीति में ये चलता है।
बुधवार की शाम मुख्यमंत्री निवास पर आमिर खान और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस थी। आमिर ने शुरुआत की....अशोक जी का धन्यवाद....अशोक जी ने ये किया....अशोक जी ने वो किया। कान्फ्रेंस के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आमिर खान के कंधे पे हाथ रखा और आगे बढ़े...उन्होने आमिर खान से शायद यही कहा होगा...कम से कम मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो कहते यार...और फिर मुस्कुराहट।

शुक्रवार, 4 मई 2012

पांच करोड़ का कमाल कलेक्टर पहुंचे बी डी की सभा में



श्रीगंगानगर- विकास डब्ल्यू एसपी के सीएमडी  बी डी अग्रवाल द्वारा प्रशासन को नगर के विकास हेतु दिये गए पांच करोड़ रुपए ने धान मंडी के नेताओं को हासिए पर डाल दिया....उनको कागजी नेता बना दिया। पांच करोड़ रुपए का ही कमाल है कि जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार खुद धान मंडी पहुंचे। बी डी अग्रवाल की ओर से आयोजित किसानों,व्यापारियों की सभा को संबोधित किया। यह पहला मौका है जब जिला कलेक्टर किसी ऐसे व्यक्ति की सभा में गए जो उद्योगपति होने के साथ साथ जमींदारा पार्टी नामक राजनीतिक दल और एक किसान संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। नगर में किसान,मजदूर, आम आदमी से जुड़ी समस्याओं पर छोटी बड़ी सभाएं होती रहती हैं। राजनीतिक भी और गैर राजनीतिक भी। किसी भी जिला कलेक्टर द्वारा कभी इस प्रकार की सभा में जाने की जानकारी नहीं है।  यह बी डी अग्रवाल के पांच करोड़ रुपए ही थे जिन्होने वर्तमान कलेक्टर अंबरीष कुमार को  परंपरा तोड़ सभा में जाने के लिए प्रेरित किया। वरना धान मंडी में बारदाने की समस्या हर बार होती है। व्यापारी,किसान,मजदूर आंदोलन करते हैं। इस बार भी हुआ। सबसे पुरानी व्यापारिक संस्था दी गंगानगर ट्रेडर्स असोसियेशन और कच्चा आढ़तिया संघ के पदाधिकारियों ने किसानों के साथ मंडी ऑफिस में अधिकारी का घेराव किया। दूसरे दिन बी डी अग्रवाल ने मोर्चा संभाला। वे जिला प्रशासन से मिले। प्रशासन के मुखिया जिला कलेक्टर ने बुधवार को मंडी आने का वादा किया। वादा निभाते हुये कलेक्टर ने  बी डी अग्रवाल की सभा में पहुँच कर नई शुरुआत की। बी डी अग्रवाल की बल्ले बल्ले हुई। सालों से मंडी में राजनीति करने वाले व्यापारियों को बी डी अग्रवाल के झंडे के नीचे आना पड़ा। जिला कलेक्टर ने सभा में क्या वादा किया....क्या कहा....बारदाना आएगा या नहीं...यहअलग बात है। बात तो ये कि इससे पहले जिला कलेक्टर कभी इस प्रकार की सभाओं में नहीं जाते थे। कानून व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हुआ तो किसी एडीएम को भेज दिया....वह भी सभा में नहीं...आजू-बाजू। नेताओं से बात की...लौट गए....जैसा चमत्कार बी डी अग्रवाल ने दिखाया ऐसा कभी देखने को नहीं मिला। कहीं पढ़ा था....सब पूछेंगे आप कैसे हैं,जब तक आपके पास पैसे हैं।




सोमवार, 30 अप्रैल 2012

सरकार जैसी दिखने वाली यह सरकार है भी या नहीं


श्रीगंगानगर-सरकार लाचार है। सरकार अवचेतन अवस्था में है। सरकार दिग्भ्रमित है। सरकार असमंजस में है। सरकार बेकार है। ऐसी सरकार कभी नहीं देखी। और इन सबसे बढ़कर सरकार जैसी दिखने वाली यह सरकार है भी या नहीं या जनता बेकार ही  भ्रम में जी रही है। विपक्ष खिल्ली खिल्ली उड़ाता है। कांग्रेस के मंत्री,सांसद,विधायक नाराज हैं। कार्यकर्ता माथा पीटते हैं। अफसरों में अविश्वास की भावना है। सरकार अच्छा करने के लिए कोई आदेश जारी करती है। बुरा हो जाता है। बुरे को सुधारने के लिए नया फरमान जारी होता है उसका पहले से भी बुरा रिजल्ट आता है। एक को मनाती  है तो अनेक रूठ जाते हैं। सभी को कोई मनाने की ताकत किसी में नहीं है....ईश्वर में भी नहीं। सब के सब किंकर्तव्यविमूढ़ हो इधर उधर देख रहें हैं। शायद कुछ ठीक हो जाए....कुछ ठीक करने के प्रयास में सब कुछ बिगड़ा जा रहा है। इससे पहले ऐसा ना तो देखा ना सुना। 21 अप्रैल को सरकार ने 48 आईपीएस के तबादले किए...इनमें 21 जिलों के एसपी थे। ये ठीक से नया कार्य शुरू भी नहीं कर पाए थे कि 23 आईपीएस की फिर बदली कर दी। पूरे राजस्थान के बात ना भी करें तो श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ के एसपी ने शनिवार को कार्यभार संभाला था। उस दिन अवकाश था। चार्ज लेने के बाद सोमवार को पहला वर्किंग डे था। लेकिन ऑफिस जाने से पहले ही उनको बदल दिया गया। ऐसा अनेक एसपी के साथ हुआ। चार्ज लेने के कुछ घंटे के बाद ही एसपी का तबादला हो जाए तो उसकी रेपुटेशन खराब होती है। यहां तो सरकार ने कइयों को बदल दिया। इस प्रकार का व्यवहार तो कोई छोटे से छोटे कर्मचारी के साथ नहीं करता। आईपीएस तो बहुत बड़ी बात है। अनेक जिलों में एसपी है भी और नहीं भी। जिनके पास चार्ज हैं वे क्या करेंगे....उनका मूड ही नहीं होगा कुछ करने को....क्या पता फिर कोई आदेश....यही स्थिति आने वालों के साथ होगी। जल्दी आने की बजाए इंतजार करेगा....कानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी सरकार की है...जब उसको ही परवाह नहीं तो अधिकारी क्यों करने लगे। इस सरकार को तो संवेदनशील कहना संवेदनशील एसएचबीडी का अपमान ही है।चंद्रभान की लाइन हैं....वक्त ने कितनी बदल डाली है सूरत आपकी,आईने में अपनी तस्वीरें पुरानी देखना। गंभीर बात है इसलिए आज एसएमएस नहीं।

शुक्रवार, 27 अप्रैल 2012

गंगा सिंह जी के बाद अंबरीष कुमार जी का नगर भ्रमण



श्रीगंगानगर-बुजुर्गों ने बताया कि महाराजा गंगा सिंह वेश बदल कर प्रजा का दुख सुख जानने के लिए रात को निकला करते थे। कहीं कुछ गलत देखते सुनते तो उसको ठीक करते। कार्य प्रणाली में सुधार होता। पीड़ित को न्याय मिलता। हम परम सौभाग्यशाली है। बड़भागी है। जो महाराजा गंगा सिंह की इस क्षेत्र में अंबरीष कुमार जैसे महा पुरुष हमारे जिला कलेक्टर बन कर अवतरित हुए। गंगा सिंह जी रात को भ्रमण करते थे वेश बदल कर। अब जमाना खराब है। पुलिस का भी कोई यकीन नहीं। रात्रि नगर भ्रमण में खतरा हो सकता है।  इसलिए कलेक्टर जी दिन में भ्रमण करते हैं। पूरे लवाजमे के साथ। ताकि सब देख लें कि कलेक्टर साहब जी को कितनी चिंता है अपनी प्रजा की। कुछ माह के उनके कार्यकाल में वे कई बार नगर दर्शन कर चुके हैं। पहली बार तो हमने भी उनकी इस पहल के लिए शुक्रिया किया था। लगा था कि बहुत कुछ होगा।परंतु घोषणाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ। जब भी नगर भ्रमण तब कोई नई घोषणा। केवल हवाई किले....ये कर दो....ऐसा होना चाहिए.....अफसरों के पास उनकी हां में हां मिलाने  के अलावा कोई रास्ता नहीं। कलेक्टर इस व्यवस्था में जिले का मालिक है कुछ भी कह सकते हैं...मिनी सचिवालय अबोहर रोड पर ले जा सकते हैं....बस अड्डा सूरतगढ़ रोड पर। ओवर ब्रिज बनने ही वाला है....सीवरेज का निर्माण इस दिन शुरू हो जाएगा। रवीन्द्र पथ  पर ट्रैफिक कम करने के लिए बसें ब्लॉक एरिया से आएंगी...जाएंगी..... बरसाती और गंदे पानी की निकासी के लिए पूंजीपतियों से मदद लेंगे। यह तो कुछ भी नहीं महाराज जी ने एक अधिकारी को इसके लिए टेंडर निकालने के आदेश दे दिये। अधिकारी था ठेठ हरियाणवी....उसने इस बारे में नोट शीट बनाकर महाराज जी के सामने रख दी। हस्ताक्षर कौन करे? जुबां हिलाने और नोट शीट पर स्वीकृति देने में बहुत अंतर है। सरकार भी जल्दी से मंजूरी नहीं देती...कलेक्टर जी कैसे देते। बात वहीं के वहीं। दो दिन चले अढ़ाई कोस.... । पता नहीं कलेक्टर जी ऐसा क्यों करते हैं। उनको कोई कुछ करने नहीं देता या उनको नगर भ्रमण कर घोषणाएँ करने का केवल शौक ही है। कलेक्टर जी से यह सब पूछने की हमारी तो हिम्मत नहीं...जिनकी हिम्मत है वे उनकी लल्ला लोरी करते हैं। इसलिए होने दो नगर भ्रमण...करने दो घोषणाएँ....अपना क्या बिगड़ता है...ऐसी तैसी  तो कांग्रेस की हो रही है, होने दो। बशीर फारुकी की लाइन हैं-इन्ही से हमको जबरन मुस्करा के मिलना पड़ता है,हमारे कत्ल की साजिश में जिन के दिन गुजरते हैं।




बुधवार, 18 अप्रैल 2012

शंकर पन्नू की याद है या भूल गए जनाब

श्रीगंगानगर-राजनीति रोमांचक तो है किन्तु निष्ठुर भी बहुत है। इतनी निष्ठुर कि उस व्यक्ति की याद तक नहीं आती जिसकी चर्चा हर स्थान पर होती थी। छोटे बड़े हर कार्यक्रम में उसकी उपस्थिति अनिवार्य जैसी ही थी। इसी प्रकार का व्यवहार राजनीति ने शंकर पन्नू की साथ किया है। अब ये भी बताना पड़ेगा कि कौन शंकर पन्नू....अरे इंजीनियर शंकर पन्नू जो पीएचईडी में अधिकारी थे। जो बाद में जिला प्रमुख बने...याद आया? नहीं....1998 में श्रीगंगानगर से एम पी चुने गए थे....वही....जो दूसरे चुनाव में हार गए थे। फिर 2003 में टिब्बी विधानसभा का चुनाव लड़ा। यस...वही शंकर पन्नू। जिनका कोई कार्यकाल कभी पूरा नहीं हुआ। सरकारी अफ़सरी से त्याग पत्र दिया। सांसद बने तो जिला प्रमुखी छोड़नी पड़ी। सांसद भी कुछ माह ही रहे। इस बार 2008 में जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने तो शंकर पन्नू के चेहरे की चमक देखने ही वाली थी। सब जानते हैं कि श्री गहलोत से उनके खास रिश्ते हैं। आना जाना जयपुर होता रहा। उम्मीद थी कि राजनीतिक नियुक्तियों में शंकर पन्नू के नंबर जरूर आयेगा। वह भी बढ़िया जगह पर। जब नियुक्तियों का सिलसिला आरंभ हुआ तो दिल में रोमांच था। अब आया नाम...अब आया। सबके नाम आ गए परंतु पन्नू जी का नाम कहीं ना दिखा ना पढ़ने में आया। नगर विकास न्यास की चेयरमेनी से लेकर...ऊपर तक के बोर्ड -निगम का दायित्व मिलने की उम्मीद थी...चर्चा भी रही। अफसोस कुछ नहीं मिला। हालांकि सरकार का कुछ नहीं पता कब किसको क्या दे दे...लेकिन शंकर पन्नू को अब कोई पद मिलने की उम्मीद राजनीतिक हल्कों में कम ही है। वैसे भी शंकर पन्नू की राजनीतिक सक्रियता बहुत कम ना के बराबर है। जहां किसी मरगत,शादी और किसी प्रोग्राम में दिखते हैं तो वह उनकी सामाजिकता है। उनकी यह उपस्थिति सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर है। लोगों की सोच भी उनके लिए यही है कि पन्नू जी तो राजनीति से चलते बने।राजनीति आजकल फूल टाइम जॉब है। वो शंकर पन्नू के पास है नहीं। वे शहर से दूर नहर किनारे अपनी नर्सरी/फार्म हाउस में रहते हैं। उनका पुनर्वास होगा या नहीं कहना मुश्किल है। क्योंकि यह राजनीति है। जिसमें ना तो कोई भविष्यवाणी की जा सकती है और ना ही किसी संभावना से इनकार। दो लाइन....टूट गए हैं रिश्ते किस्से खत्म हुए,तुम क्या जानो बात कितने जतन हुए।

प्यार की बात

तुझसे प्यार की बात बहुत मुश्किल है
वक्त तो तुझे देखने में ही गुजर जाता है।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

संधू एंड कंपनी और गौड़ अब राजनीति में साथ साथ

श्रीगंगानगर-राजनीति में किसी से किसी भी प्रकार का संबंध कभी स्थाई नहीं हो सकता। यहां नए रिश्ते बनते भी देर नहीं लगती और पुराने बिगड़ते भी। एक से अनेक हो जाते हैं और अनेक से एक। कोई अधिक समय नहीं हुआ जपृथ्वीपाल सिंह संधू एंड कंपनी के रिश्ते सेठ से बहुत प्रगाढ़ थे। पारिवारिक कहे जाते थे। दिल्ली जयपुर के राजनीतिक गलियारों में एक साथ जाना। राजनीति में गोटी फिट हो गई। किस्मत ने साथ दिया। सेठ न्यास के अध्यक्ष बन गए। संधू एंड कंपनी की बल्ले बल्ले हो गई। पर ये समय है...एक समान कहां,कब रहता है। पलट गया समय... अध्यक्ष बने सेठ ने संधू के बंदों के अहम पर चोट की...मतलब इनके तालाब की मछली इनको ही आँख दिखाने लगी। सेठ और संधू एंड कंपनी का याराना टूट गया। रिश्ते बिगड़ गए। संबंध समाप्त। रास्ते अलग अलग। इसके बावजूद संधू एंड कंपनी के दिलो दिमाग पर सेठ के साथ रिश्ते की मिठास और उसका रस आज भी है। लेकिन ये राजनीति हैं...यहां स्वार्थ,अहम जब टकराते हैं तो फिर रसगुल्ले जैसी मिठास और रस वाले रिश्तों की परवाह नहीं की जाती। नए रिश्ते तलाश किए जाते हैं। यह तलाश राजकुमार गौड़ पर जाकर समाप्त हो गई। इसमें कोई पर्दा नहीं है कि संधू एंड कंपनी ने विधानसभा चुनाव में गौड़ साहब की कितनी और किस प्रकार मदद की थे। परंतु यही तो राजनीति है...दोनों को एक दूसरे की आज जरूरत है। गौड़ साहब को थोड़ी आशंका है कि सेठ उनका प्रतिद्वंद्वी ना बन जाए। इसलिए उसको कमजोर रखना जरूरी है....संधू एंड कंपनी उसको आँख दिखाने का परिणाम दिखाना चाहती हैं। दोनों की मंजिल एक थी इसलिए ये दोनों नजदीक आ गए।श्री गौड़ का श्रीगंगानगर विधानसभा क्षेत्र में अपना महत्व है। मुख्यमंत्री से उनके रिश्ते भी बढ़िया है। संधू एंड कंपनी की दिल्ली जयपुर में अच्छी लाइजनिंग है। अब गौड़ और संधू गुट फिलहाल एक है। यह एकता केवल सेठ जी को निपटाने तक ही है या दूर तक दिखाई देगी ये कहना मुश्किल है। क्योंकि यह ऊपर लिखा जा चुका है कि राजनीति में रिश्ते बनते बिगड़ते रहते हैं। वैसे श्रीगंगानगर में ये दोनों गुट ही अधिक प्रभावी हैं। किन्तु फिलहाल दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। चाहे दिखावे के लिए ही सही।

सोमवार, 19 मार्च 2012

जो सरक सरक के काम करे वह सरकार

श्रीगंगानगर- जब से कुछ जानने लगा हूं तभी से यही मानता रहा कि सरकार वह जो सरक सरक के काम करे। लेकिन कोई केंद्र सरकार इतनी भी सरक सकती है ये नहीं सोचा था। इसे सरकना कहा तो क्या कहा....यह तो रेंगना हुआ....साफ साफ रेंगना। कई दिन से नाटक खेला जा रहा है हिंदुस्तान की छाती पर....देश की आन,बान,शान को मिट्टी में मिलाने का। इसके पात्र हैं सभी राजनीतिक दल। कोई आदमी तो मजबूर हो सकता है। कोई सरकार भी इतनी मजबूर होगी ये तो कल्पना से परे है। देश की चिंता नहीं। जनता के दुख दर्द से कोई लेना देना नहीं। सब के सब लगे हैं अपनी खुंदक निकालने में। अपने अहंकार को और अधिक पुष्पित,पल्लवित करने में। एक दूसरे को नीचा दिखाने में। अपनी अपनी नाक को ऊंचा रखना है। देश की नाक कटे तो कटे। लगता ही नहीं कि कोई सरकार चला रहें हैं। ये तो धक्केशाही है इस देश के आमजन के साथ। जिस प्रकार ये देश चला रहें हैं इस प्रकार से तो कोई घर नहीं चलता। देश को संभालने की बात तो बहुत दूर की है। ये क्या सरकार....ये कैसा प्रधानमंत्री....जिसका जी किया आँख दिखा दी....जिस किसी कि इच्छा हुई उसने टेंटुआ दबा दिया। ऐसी क्या मजबूरी...अपने जमीर को तो आपने मैडम के कदमों में डाल दिया। देश की प्रतिष्ठा का तो कोई ख्याल करो। इसकी इस प्रकार तो मिट्टी ना करो। कुछ तो मर्दानगी दिखाओ। ममता...मुलायम ताबे नहीं आ रहे तो आ जाओ चुनाव मैदान में। रोज रोज का नाटक तो समाप्त हो। देश का रेल मंत्री...या कोई भी मंत्री कौन होगा....त्रिवेदी...हो या चतुर्वेदी...मुकुल हो या नुकुल....इससे से जनता का कोई मतलब नहीं होता। जनता से पूछ कर कोई किसी को बनाता या हटाता भी नहीं है। परंतु किसी को हटाने...बनाने का ये क्या तरीका हुआ। इस प्रकार तो बच्चों की गली वाली क्रिकेट टीम में भी नहीं होता। पूरा संसार नेताओं का यह नाटक देख रहा है। मामूली सी समझ रखने वाला भी कह देगा कि यह गलत हो रहा है। किन्तु अफसोस इनको खुद को यह महसूस नहीं हो रहा। ओह! इनको महसूस हो भी कैसे....इनके दो वो दिल ही नहीं जो जनता की भावनाओं को समझ सकें। ऐसा होता तो ये नाटक होता ही नहीं। चलो ये पढ़ोमनमोहन जी टिके हुए हैं बिना किए कुछ काम,उनकी जुबां पर रहता है बस इक मैडम का नाम, भज ले नारायण का नाम, भज ले नारायण का नाम